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Sunday, 23 December 2012

अगर सरकार, पुलिस, अदालत चाहे तो बलात्कार मामले 10 दिन में निपटाए जा सकते हैं


 Published on 23 December, 2012
 अनिल नरेन्द्र
राजधानी में गत रविवार रात चलती बस में बलात्कार करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग को लेकर शुक्रवार (पांचवां दिन) को भी बड़ी संख्या में छात्राओं और महिलाओं ने प्रदर्शन-धरना, कैंडिल मार्च जारी रखे। नई दिल्ली में राजपथ, सफदरजंग अस्पताल, इंडिया गेट, जंतर-मंतर, प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय जैसी प्रमुख जगहों पर दिनभर प्रदर्शनों की श्रृंखला जारी रही। सभी की एक ही मांग थी कि दोषियों को जल्द कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। दरअसल आज अगर जनता इतनी उत्तेजित है तो इसलिए भी क्योंकि दुष्कर्मियों का मनोबल बढ़ाने की एक वजह हमारा सिस्टम भी है। दुष्कर्म के मामले 10-10 सालों तक अदालतों में चलेंगे तो ऐसे में इस तरह की घटनाओं पर कैसे विराम लग सकता है? दिल्ली की अलग-अलग अदालतों में बलात्कार के 10 हजार से भी अधिक मामले इस समय विचाराधीन हैं और अगर पूरे देश का हिसाब लगाया जाए तो यह संख्या लाखों में होगी। सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की बात तो कर रही है। पुलिस अगर सही तरीके से छानबीन करे तो ऐसे मामलों में 7 से 10 दिन में छानबीन पूरी कर सकती है। कानूनी जानकार बताते हैं कि सब कुछ पुलिस की इच्छाशक्ति पर निर्भर है। पुलिस चाहे तो 7 से 10  दिन में छानबीन पूरी करके चार्जशीट दाखिल कर सकती है। चार्जशीट के  बाद ट्रायल रोजाना किया जाए तो ज्यादा वक्त नहीं लगना चाहिए। लेकिन पुलिस को छानबीन के दौरान कुछ अहम बिन्दुओं पर जरूर ध्यान रखना होगा ताकि छानबीन में कोई कमी न रहे। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील केटीएस तुलसी ने बताया कि  पुलिस को इस तरह के मामले में साइंटिफिक एविडेंस पर ध्यान देना होगा। बस बरामद की जा चुकी है। आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं। बस से फिंगर प्रिंट लेकर  ब्लड सैम्पल और वारदात में इस्तेमाल रॉड इत्यादि पर लगे खून के निशान के सैम्पल उठाए जा रहे हैं और इन तमाम सैम्पल की फोरेंसिक रिपोर्ट आनी है। प्राथमिकता के आधार पर फोरेंसिक लैब से कहा गया है कि वह रिपोर्ट जल्द दे। सुप्रीम कोर्ट के क्रिमिनल लॉयर डीबी गोस्वामी ने बताया कि रेप के केसों में लड़की का बयान अहम होता है। जहां तक मौजूदा मामले का सवाल है तो इस मामले में लड़की का बयान व लड़की के दोस्त का बयान दर्ज किया जाना है। साथ ही लड़की का मेडिकल टेस्ट करने वाले डाक्टर का बयान लिया जाएगा। जिस पुलिसकर्मी ने एफआईआर दर्ज की है उसका बयान  लिया जाएगा। इसके अलावा जांच अधिकारी का बयान और फोरेंसिक जांच करने वाले अधिकारी का बयान कलमबद्ध किया जाना है। इसके अलावा पुलिस अगर चाहे तो 100 नम्बर डायल करने वाले शख्स और कॉल अटैंड करने वाले पुलिसकर्मी को भी गवाह बना सकती है। लड़की, उसके दोस्त, दोनों की मेडिकल रिपोर्ट, आरोपियों की मेडिकल रिपोर्ट के साथ फोरेंसिक रिपोर्ट अहम सबूत है। इन गवाहों के चयन और सबूतों को इकट्ठा करने में पुलिस को 7 से 10 दिन का समय लग सकता है। इसके बाद पुलिस चार्जशीट दाखिल करे। चार्जशीट फोरेंसिक रिपोर्ट के बिना भी दाखिल हो सकती है और रिपोर्ट आने पर सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की जा सकती है। अगर लड़की बयान देने लायक हो जाए तो अच्छी बात है अन्यथा तमाम साइंटिफिक एविडेंस और उसके दोस्त के बयान काफी अहम हैं। चूंकि दोस्त खुद भी जख्मी है ऐसे में वह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। पुलिस को चाहिए कि वह गवाहों की लम्बी लिस्ट न बनाए और केवल महत्वपूर्ण बयानों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करे। डे टू डे ट्रायल होना चाहिए। सम्भव हो तो केवल महिला जज ही मुकदमा देखें। महिला वकील ही पेश हों।  लड़की से बेहूदा सवालों से बचा जाए केवल उन सवालों पर ध्यान केंद्रित किया जाए जो कनविक्शन के लिए जरूरी है। ऐसे केसों में अपील की प्रक्रिया पर भी विचार करना होगा। या तो इसकी समय अवधि और प्रक्रिय तय की जाए या फिर अपील मंसीडर्ड पेटीशन न रखी जाए पर यह सब कुछ पुलिस, सरकार, अदालत व फोरेंसिक एवं साइंटिफिक लैबों पर निर्भर होगा। दुखद पहलू एक यह भी है कि हम उस सरकार व जनप्रतिनिधियों से उम्मीद लगाए बैठे हैं जिनमें से कई विधायक, पूर्व विधायक व सांसद खुद दुष्कर्म के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं। यह लोग ऐसे गम्भीर आरोपों को भी राजनीतिक मुद्दा बनाकर मामले को आगे बढ़ने से रोक देते हैं। जनता भी ऐसे गम्भीर आरोपी नेताओं को बार-बार क्यों चुनती है, हमारी समझ से तो बाहर है। चूंकि यूपीए सत्ता में है हम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बहुत उम्मीद रखते हैं कि वह इस मामले में पहल करके ऐसी व्यवस्था बनवा दें ताकि बलात्कार मामलों का निपटारा शुरू से सजा तक 30 दिन में खत्म हो जाए।

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