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Wednesday, 5 December 2012

धोखा, भ्रम फैलाने वाले विज्ञापनों पर कार्रवाई होनी चाहिए


 Published on 5 December, 2012
 अनिल नरेन्द्र 
आजकल टीवी और समाचार पत्रों में ऐसे विज्ञापनों की कमी नहीं जिनमें दावा किया जाता है कि उनके सेवन से कम से कम समय में मोटापे, डायबिटीज यहां तक कि दिल से जुड़ी बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। बच्चों से संबंधित विज्ञापनों की तो बाढ़-सी आ गई है। उदाहरण के तौर पर दूध में मिला दिए जाने वाले पदार्थ बनाने वाली कम्पनियों के विज्ञापनों में बच्चों के विकास और याद्दाश्त में दोगुनी गति से बढ़ोतरी, शरीर को तुरन्त ऊर्जा देने और शक्ति मिलने, अपनी लम्बाई दो इंच बढ़ाने आदि का दावा किया जाता है। ये उत्पाद बाजार में खासी लोकप्रियता अर्जित कर चुके होंगे तभी तो यह निर्माता कम्पनियां लाखों रुपए विज्ञापनों पर खर्च करती हैं। इसी तरह से कहा जाता है कि चॉकलेट मिले पेय पदार्थों से बच्चे लम्बे, ताकतवर और तेज हो जाते हैं। लेकिन चिन्ता का विषय यह है कि अभी तक कोई भी तथ्यगत जानकारी या वैज्ञानिक अध्ययन सामने नहीं आया जो इन दावों की पुष्टि करता हो। शायद यही वजह है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानि एफएसएसआई ने कई शिकायतों के मद्देनजर ऐसे 38 मामलों को नोटिस जारी किया है। अखबारों, टीवी चैनलों और दूसरे प्रचार माध्यमों पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों संबंधित उत्पादों की विशेषताओं के बारे में दावों को जांचने-परखने की जरूरत शायद ही समझी जाती है। दरअसल हमें लगता है कि खाने-पीने से लेकर सौंदर्य प्रसाधन जैसे ज्यादातर उत्पादों के विज्ञापनों में जो दावा किया जाता है उसमें तथ्य कम होता है, भ्रम ज्यादा। मुश्किल एक यह भी है कि ऐसे दावों की वास्तविकता की जांच-परख की न तो कोई कसौटी मौजूद है और न ही इन पर कारगर तरीके से रोक लगाने के लिए कोई तंत्र। जबकि डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थों से लेकर दवाओं या दूसरी तमाम उपभोक्ता सामग्री के विज्ञापनों में किए गए दावे लोगों के विवेक पर असर डालते हैं और वे दूसरे विकल्पों पर गौर करना छोड़ देते हैं। शरीर, सेहत और इसके रूप-रंग को लेकर कई तरह की सकारात्मक-नकारात्मक पूर्व धारणाएं लोगों के मन मस्तिष्क में गहरी पैठी हुई हैं और इनमें मनचाहे बदलाव का भरोसा देकर इन भावनाओं का दोहन करना कम्पनियों के लिए आसान होता है। गोरेपन की क्रीम या मोटापे घटाने की दवाओं के बारे में जो दावे किए जाते हैं, उन्हें केवल झूठ और धोखा भी कहा जा सकता है। इनके दुष्परिणामों की अक्सर खबरें आती रहती हैं। विडम्बना तो यह है कि उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए जाने-माने फिल्म सितारों, खिलाड़ियों या नामचीन हस्तियों का सहारा लिया जाता है। जहां हम एफएसएसआई द्वारा उठाए गए कदम का स्वागत करते हैं वहीं यह सवाल भी वाजिब है कि जब खुद एफएसएसआई खुद यह कहता है कि ऐसे विज्ञापन केवल लोगों को भ्रमित करते हैं तो यह सब इतने वर्षों से क्यों चल रहा है, क्यों नहीं इन विज्ञापनों पर रोक लगाई गई और संबंधित कम्पनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए?

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