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Saturday, 29 December 2012

फास्ट ट्रैक कोर्ट यानि जल्द इंसाफ की जमीनी हकीकत

 
 Published on 29 December, 2012
 अनिल नरेन्द्र
चलती बस में गैंगरेप की घटना के बाद सरकार ने रेप के मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का जो फैसला किया है उसका जहां हम स्वागत करते हैं वहीं यह भी जरूर बताना चाहेंगे कि इसको अमल में लाना इतना आसान नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली की सभी छह अदालतों (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) में पेन्डिंग रेप केसों की डिटेल भी तैयार करा ली है, जिससे इन केसों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में डे टू डे आधार पर शुरू कराई जा सके। इसका मुख्य मकसद पीड़ितों को जल्द इंसाफ दिलाना है। फास्ट ट्रैक कोर्ट से तात्पर्य ऐसी कोर्ट से है जिसमें एक खास तरह के केसों की सुनवाई होगी। इस समय मादक पदार्थ की तस्करी से जुड़े केसों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक  कोर्ट बनाई गई है, लेकिन विडम्बना यह है कि इन सभी फास्ट ट्रैक कोर्ट में इनके अलावा दूसरे केसों की सुनवाई भी होती है। इससे सिर्प नाम का ही फास्ट ट्रैक कोर्ट रह गया है। इन कोर्टों में स्पेशल केसों की जजमेंट में काफी लम्बा समय लग रहा है। गैंगरेप मामले के बाद देशभर में उपजे आक्रोश से सरकार फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर दुष्कर्म के मामलों का जल्दी से जल्दी निपटारा करने की बात को कह रही है, लेकिन हकीकत यह है कि महज पांच फास्ट ट्रैक कोर्ट बना देने से दुष्कर्म के मामलों का निपटारा सम्भव नहीं होगा। दिल्ली की अदालतों में ऐसे दस हजार से भी ज्यादा मामले लम्बित हैं। वहीं गठित की जा रही पांच फास्ट ट्रैक कोर्ट के पास कम से कम दो-दो हजार मामलों को तुरन्त निपटाने की चुनौती होगी, जो कि आसान नहीं है। इसलिए न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग दिल्ली में कम से कम 20 फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने की बात कह रहे हैं। दुष्कर्म मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ानी होगी। इन कोर्ट को दिल्ली की अदालतों में लम्बित दस हजार से अधिक दुष्कर्म के मामलों का निपटारा करने में कम से कम एक साल का समय लग जाएगा। एक सेवानिवृत अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश प्रेम कुमार का कहना है कि दुष्कर्म के प्रत्येक मामले की प्रतिदिन सुनवाई सम्भव नहीं है। अगर आरोपी एक से अधिक हैं तो उनके वकील भी अधिक होंगे। जन आक्रोश को ठंडा करने के लिए सरकार भी फास्ट ट्रैक अदालत या विशेष अदालत का आश्वासन देकर अपने दायित्व की पूर्ति  समझ बैठी है। लेकिन अगर सरकार जजों के स्वीकृत पदों को भरने का वाकई ठोस उपाय करे तो वह शीघ्र अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा कर सकती है। जजों के रिक्त पद तथा लम्बित मुकदमों के आंकड़े देश की न्यायिक व्यवस्था की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। निचली अदालतों में सितम्बर 2011 तक दो करोड़ 73 लाख केस लम्बित थे। इनमें एक करोड़ 95 लाख आपराधिक केस थे। देशभर की जिला अदालतों में जजों के 18 हजार 123 पद स्वीकृत हैं। लेकिन इस समय सिर्प 14 हजार 287 जज कार्यरत हैं यानि तीन हजार 836 पद रिक्त पड़े हैं। जिला अदालतों में दो स्तर पर जज नियुक्त किए जाते हैं। ज्यूडिशियल सर्विस और हायर ज्यूडिशियल सर्विस। ज्यूडिशियल सर्विस में मजिस्ट्रेट और सिविल जज की भर्ती, प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए होती है जबकि अतिरिक्त सत्र एवं जिला न्यायाधीश हायर ज्यूडिशिरी के सदस्य होते हैं। जजों की भारी कमी के कारण अदालतें मुकदमों के बोझ से झुकी जा रही हैं। अगर रेप केसों में हमें प्रभावी फास्ट ट्रैक न्याय देना है तो पहले मौजूदा कमियों को भी पूरा करना होगा तभी हम अपने उद्देश्य में सफल हो सकते हैं। सिर्प घोषणा से काम नहीं होने वाला।

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