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Thursday, 6 December 2012

अस्थिरता और तनावपूर्ण स्थिति की ओर बढ़ता मिडल ईस्ट


 Published on 6 December, 2012
  अनिल नरेन्द्र
मध्य पूर्व एशिया में एक बार फिर स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही है। मिस्र, इजराइल और फिलीस्तीन इन तीनों देशों में फिर से हलचल तेज हो गई है। पहले बात हम मिस्र की करते हैं। मिस्र की सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव बढ़ गया है। देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ने इस्लामी मूल्यों वाले संविधान के मसौदे पर जनमत संग्रह कराने के राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी के फैसले का विरोध किया है। उसने 15 दिसम्बर को पस्तावित जनमत संग्रह का निरीक्षण करने से इंकार कर दिया है। मिस्र के शीर्ष न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति मोहम्मद मोरसी के इस्लामवादी समर्थकों के मनोवैज्ञानिक एवं भौतिक दबाव के खिलाफ अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की जबकि करीब एक दर्जन अखबारों ने भी विपक्ष के समर्थन में अपने संस्करण नहीं निकालने की घोषणा की। मोरसी ने पिछले महीने अपने शासनादेशों के माध्यम से निरपुंश सत्ता हासिल कर ली थी। इसके बाद विपक्ष के साथ उनका टकराव तेज हो गया। इसी बीच शीर्ष संवैधानिक न्यायालय ने कहा कि इस्लामवादियों ने न्यायाधीशों को अदालत परिसर में घुसने से रोका जिसके विरोध में वह अपना कामकाज अस्थाई रूप से स्थगित कर रहे हैं। कई अखबारों में नए संविधान के विरोध में अपने पहले पन्ने पर तानाशाही नहीं चलेगी का नारा भी लिखा।
उधर इजराइल और फिलीस्तीन के बीच तनाव बढ़ गया है। फिलीस्तीन के इतिहास में उसे एक शानदार सफलता मिलने से इजराइल बौखला गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत समेत 138 देशों ने फिलीस्तीन के समर्थन में मतदान करके उसका इस वैश्विक संस्था का कद बढ़ा दिया। वैश्विक संस्था में फिलीस्तीन की यह ऐतिहासिक जीत है। इजराइल के लिए यह एक झटका मा जा रहा है। बृहस्पतिवार देर रात महासभा के कुल 193 सदस्यों में से अमेरिका और इजराइल समेत केवल नौ देशों ने फिलीस्तीन के पस्ताव के विरोध में वोट डाला, जबकि 41 देशों ने मतदान के दौरान अपनी अनुपस्थिति दर्ज कराई। इस बड़ी जीत के साथ ही वैश्विक निकाय में अब फिलीस्तीन का दर्जा गैर सदस्य पर्यवेक्षक राष्ट्र का होगा। महासभा में मतदान से पहले अपने संबोधन में फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने कहा कि यह वोटिंग दरअसल फिलीस्तीन राज्य के लिए एक जन्म पमाण पत्र की तरह होगी। उन्होंने कहा कि 65 साल पहले आज ही के दिन महासभा ने पस्ताव 181 को मंजूरी देकर फिलीस्तीन को दो हिस्सों में बांटा था और इजराइल को जन्म पमाण पत्र दे दिया था। अभी तक संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन को पाधिकरण पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल था। संयुक्त राष्ट्र में पस्ताव पारित होने के बाद गाजा और पश्चिमी तट (वैस्ट बैंक) पर जश्न जैसा माहौल देखा गया। इसके साथ ही फिलीस्तीन ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मुल्क के तौर पर मान्यता हासिल करने की दिशा में एक और पड़ाव तय कर लिया। पस्ताव का विरोध करते हुए इजराइल के राजूदत रॉन पोसोर ने मतदान से पहले महासभा को संबोधित करते हुए कहा इस पस्ताव से शांति को कोई पोत्साहन नहीं मिलेगा, बल्कि इसमें शांति को झटका ही लगेगा। इजराइली लोगों का इजराइल से 4000 साल पुराना नाता संयुक्त राष्ट्र के किसी फैसले से टूटने वाला नहीं है। यूएस में अमेरिकी राजदूत सूसान राइस ने मतदान के बाद कहा कि आज यह पस्ताव शांति की राह में और अधिक रोड़े अटकाने वाला पस्ताव है। ब्रिटेन और जर्मनी ने इस पस्ताव के लिए वोटिंग में भाग नहीं लिया। लेकिन दोनों देशों में इस पस्ताव के लाए जाने से खुशी नहीं है। पिछले साल फिलीस्तीनी पाधिकरण ने पूर्ण सदस्यता हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में अर्जी दी थी लेकिन सुरक्षा परिषद में अमेरिका ने उस पस्ताव को वीटो कर दिया था और fिंफलीस्तीन की कोशिशों पर पानी फेर दिया था। अरब वर्ल्ड में इस फैसले पर खुशी का माहौल है। ईरान और अमेरिका के बीच भी तनाव बढ़ता जा रहा है। कुल मिलाकर मिडल ईस्ट में अस्थिरता और तनाव की स्थिति बढ़ती जा रही है। उम्मीद करते हैं कि हालात काबू में ही रहें क्योंकि अगर तनाव बढ़ता है तो इसका फालआउट मिडल ईस्ट तक ही सीमित नहीं रहेगा।

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