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Tuesday, 8 June 2021
गुलाम दौर का यह राजद्रोह कानून खत्म होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया कि सरकार पर सवाल उठाना राजद्रोह नहीं होता है। अदालत ने यह भी कहा कि बात-बात पर राजद्रोह की संगीन धाराओं में मुकदमे की प्रवृत्ति गलत है और इस पर रोक लगनी चाहिए। हर पत्रकार को इस मामले में संरक्षण प्राप्त है। देखना है कि सरकारें इसे समझ पाती हैं या नहीं। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार विनोद दुआ के यूट्यूब कार्यक्रम को लेकर शिमला में दर्ज राजद्रोह का मामला गुरुवार को खारिज करते हुए कहा कि 1962 का फैसला प्रत्येक पत्रकार को सुरक्षा का अधिकार देता है। एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि नागरिक को सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों या उपायों की आलोचना करने या टिप्पणी करने का पूरा अधिकार है। यह अधिकार तब तक हैं कि वह लोगों को सरकार के खिलाफ हिंसा करने या सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने के इरादे से नहीं उकसाता है। शीर्ष अदालत ने इसके साथ वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर हिमाचल में दर्ज राजद्रोह के मुकदमे को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहाöसभी पत्रकार, शीर्ष अदालत द्वारा केदारनाथ सिंह मामले में वर्ष 1962 में दिए फैसले के तहत संरक्षित हैं। तब राजद्रोह कानून का दायरा तय किया गया था। दुआ पर पिछले साल लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के पलायन पर अपने यूट्यूब कार्यक्रम में सरकार की आलोचना पर राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था। जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस विनीत शरण की पीठ ने कहाöजब शब्दों या अभिव्यक्तियों में सार्वजनिक अव्यवस्था या कानून-व्यवस्था की गड़बड़ी पैदा करने की खतरनाक प्रवृत्ति या इरादा होता है, तभी भारतीय दंड संहिता की धारा-124ए के तहत मामला बनता है। पीठ ने कहाöदुआ के बयानों को अधिक से अधिक सरकार और उसके प्राधिकारियों के कार्यों के प्रति अस्वीकृति की अभिव्यक्ति कहा जा सकता है, ताकि मौजूदा हालात को जल्दी और कुशलता से निपटने के लिए प्रेरित किया जा सके। अपने आदेश में पीठ ने कहाöविनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह अभियोजन चलाना अन्यायपूर्ण होगा। पीठ ने कहाöदुआ के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। ऐसे में अभियोग चलाना, बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। एडीर्ट्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह के मुकदमे पर वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का शुक्रवार को स्वागत किया। और कठोर और पुराने राजद्रोह कानूनों को रद्द करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गिल्ड ने एक बयान में कहाöस्वतंत्र मीडिया और हमारे लोकतंत्र पर राजद्रोह के कानूनों का कठोर असर पर सुप्रीम कोर्ट की चिंताओं पर संतोष जताया। इसमें कहा गया है कि गिल्ड इन कठोर पुराने कानूनों को रद्द करने की मांग करती है जिनका किसी भी आधुनिक लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। गिल्ड ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने दुआ के खिलाफ आपराधिक शिकायत को न केवल रद्द किया बल्कि राजद्रोह के मामलों से पत्रकारों की सुरक्षा करने की महत्ता पर भी जोर दिया। हमारा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पत्रकारों पर लटकी तलवार से निजात मिलेगी। उम्मीद की जाती है कि एक नहीं अनेक बार अदालतों ने यह साफ किया है कि सरकार की आलोचना करना, प्रधानमंत्री या मंत्री या उनके अधिकारियों पर विपरीत टिप्पणी करना राजद्रोह नहीं बनता। सरकार बार-बार इस धारा को लगाकर पत्रकारों को परेशान करती है। पर देखना यह है कि यह बात सरकारों को समझ आती है या नहीं?
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