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Sunday, 10 October 2021
महामारी से तो बच गए पर यह महंगाई मार डालेगी
कोरोना महामारी की दूसरी लहर जैसे-जैसे दम तोड़ रही है, आफत की एक नई लहर परवान चढ़ रही है। कोरोना की लहर से तो लोग किसी तरह बच भी गए पर अब जो लहर चल रही है उससे कोई बचने वाला नहीं। यह लहर है भयंकर महंगाई की। जिसके असर से सब पीड़ित हैं, लेकिन दुख है कि कोई कराह नहीं रहा। सब अपनी किस्मत को कोस रहे हैं और हाथ मल रहे हैं। कोरोना लाखों लोगों की नौकरियां खा गया और लाखों लोगों का वेतन आधा-अधूरा हो गया। लोग रिश्तेदारों से पैसे मांगकर या कर्ज लेकर किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। पिछले दो-तीन दिनों से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते जा रहे हैं। इसके लिए लोग अपना बजट बैलेंस कर ही रहे थे कि अब घरेलू गैस सिलेंडर के दाम भी 15 रुपए बढ़ा दिए गए हैं। ऐसे में चाहकर भी लोग अपना बजट संतुलित नहीं कर पा रहे हैं। समझ नहीं आ रहा कि कहां से घटाएं और कहां पर जोड़ें। दिल्ली के बाजार में शुक्रवार को पेट्रोल प्रति लीटर 103.54 रुपए पर चला गया जबकि डीजल 92.12 रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। पिछले 11 दिनों से पेट्रोल की कीमत में 2.35 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हुई है। गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने की वजह से रसोई के बजट पर असर पड़ा है। सब्जी से लेकर सरसों का तेल सबके तो दाम बढ़े हैं। कारोबार पर अभी कोविड महामारी का असर है। इस साल भी रसोई गैस के दाम जनवरी से हर महीने 15-25 रुपए के हिसाब से बढ़ाए जाते रहे हैं। अब इसमें और 15 रुपए की वृद्धि की गई है। गरीबों के काम आने वाले पांच किलो का सिलेंडर भी 500 रुपए से अधिक महंगा है। चाहे सब्सिडी वाला हो, बिना सब्सिडी वाला या कॉमर्शियल हो, हर तरह के सिलेंडर के दाम आसमान छू रहे हैं। सरकार का एक मासूम तर्प है कि तेल और गैस के दाम पेट्रोलियम कंपनियां तय करती हैं और यह रेट अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों के आधार पर होते हैं। इन पर नियंत्रण किसी सरकार के वश में नहीं है। यह माना जा सकता है कि फिलहाल पेट्रोलियम पदार्थों के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कुछ ऊपर चल रहे हैं, लेकिन कोरोना काल में जब यह दाम काफी नीचे आ गए थे, तब भी देश के उपभोक्ताओं पर दाम बढ़ाकर लगातार बोझ डाला गया था। यह सही है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रसोई गैस और कच्चे तेल के दामों को नियंत्रित कर पाना सरकार के दायरे के बाहर है। लेकिन देश के भीतर लोगों को उचित दामों पर यह चीजें कैसे मिलें, इसके उपाय तो किए ही जा सकते हैं। पेट्रोल और डीजल पर लगाए जाने वाले भारी-भरकम शुल्कों को लेकर लंबे समय से आवाज उठती रही है। एक लीटर पेट्रोल या डीजल के दाम में दो-तिहाई के करीब तो केंद्र और राज्यों द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क ही होते हैं। सरकारों ने इसे खजाना भरने का बड़ा और आसान जरिया बना लिया है। दरअसल सरकारें जानती हैं कि ईंधन, रसोई गैस, दूध, खाने-पीने का सामान कितना भी महंगा क्यों न कर दिया जाए, लोग बिना खरीद के रह नहीं सकते। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने पर कोई सहमति नहीं बनती दिखना भी बता रही है कि भविष्य में पेट्रोलियम उत्पाद और महंगे ही होंगे, यानि हर तरह से महंगाई बढ़ेगी। जनता परेशान है क्योंकि ईंधन, दूध और घर चलाने के लिए सामान खरीदना उसकी मजबूरी है चाहे दाम कितने ही बढ़ जाएं, लेकिन जनता कब तक ऐसा झेलेगी? ऐसा न हो कि लोगों की बिगड़ती माली हालत सरकारों का ही पसीना न छुड़ा दे।
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